विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- दिल्ली स्थित एक विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रंका की जमानत के लिए प्रस्तुत जमानतदारों को स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत प्रदान की।
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के बारे में
- कानूनी आधार: राज्य सरकारें विशिष्ट क्षेत्रों या उद्देश्यों के लिए विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति करती हैं तथा उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को प्राप्त शक्तियाँ प्रदान करती हैं।
- कार्य: इनकी नियुक्ति एक निश्चित अवधि, क्षेत्र या कार्य के लिए की जाती है। उदाहरण के लिए, ऐसी विशेष परिस्थितियाँ जिनमें निवारक कार्रवाई अथवा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता होती है।
- इनकी शक्तियाँ राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों पर भी निर्भर करती हैं।
- शक्तियों की प्रकृति: विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को ऐसी परिस्थितियों में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया जाता है, जहाँ शांति भंग होने की आशंका हो। इसका उद्देश्य अपराध घटित होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित अशांति को पहले ही रोकना है।
- वे निवारक एवं प्रशासनिक कार्यों के माध्यम से सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हैं और शांति भंग होने से रोकते हैं।
- विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की भूमिका प्रशासनिक कार्यों तक सीमित होती है। वे इन कार्यवाहियों के अंतर्गत आपराधिक मुकदमों का विचारण नहीं कर सकते और न ही किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा सकते हैं।
- न्यायिक समीक्षा: विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की कार्रवाइयाँ न्यायिक समीक्षा तथा प्रशासनिक निगरानी के अधीन होती हैं, ताकि उनकी वैधता सुनिश्चित की जा सके और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र क्या है?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 कार्यपालक मजिस्ट्रेट को शांति भंग होने से रोकने के लिए किसी व्यक्ति से अधिकतम एक वर्ष की अवधि तक शांति बनाए रखने संबंधी बंधपत्र निष्पादित कराने का अधिकार देती है।
- यदि कोई व्यक्ति इस बंधपत्र की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो मजिस्ट्रेट उसे गिरफ्तार करने या बंधपत्र की शेष अवधि के लिए निरुद्ध करने का आदेश दे सकता है।
स्रोत: TH
रक्ताल्पता (एनीमिया)
पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य
समाचारों में
- रक्ताल्पता भारत की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बनी हुई है।
रक्ताल्पता (एनीमिया)
- अर्थ: रक्ताल्पता ऐसी स्थिति है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या अथवा उनमें उपस्थित हीमोग्लोबिन की सांद्रता सामान्य स्तर से कम हो जाती है।
- यह मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों को प्रभावित करती है।
- कारण: रक्ताल्पता के प्रमुख कारणों में अपर्याप्त पोषण, संक्रमण, दीर्घकालिक रोग, अत्यधिक मासिक धर्म रक्तस्राव, गर्भावस्था से संबंधित समस्याएँ तथा पारिवारिक इतिहास शामिल हैं।
- यह प्रायः शरीर में लौह तत्त्व की कमी के कारण होती है।
- जब शरीर में अंगों और ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं होता, तब रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न होती है।
- प्रभाव: गंभीर स्थिति में बच्चों के संज्ञानात्मक विकास तथा शारीरिक गतिविधियों से संबंधित कौशल के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- यह गर्भवती महिलाओं और उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है।
- उपचार: रक्ताल्पता की रोकथाम और उपचार उसके मूल कारणों पर निर्भर करते हैं।
- लौह तत्त्व, फोलेट, विटामिन B12, विटामिन A तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्त्वों से भरपूर संतुलित आहार इसके उपचार में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त, योग्य स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार पोषक तत्त्वों की पूरक खुराक भी दी जा सकती है।
- रोकथाम के उपायों में मलेरिया तथा परजीवी कृमियों से होने वाले संक्रमणों पर नियंत्रण, बेहतर स्वच्छता, टीकाकरण और दीर्घकालिक रोगों का उचित प्रबंधन शामिल हैं।
- भारत द्वारा उठाए गए कदम: भारत सरकार की ‘7×7×7 एनीमिया मुक्त भारत (AMB) रणनीति’ रक्ताल्पता की बहुआयामी प्रकृति को स्वीकार करती है। यह रोकथाम, जाँच, उपचार, आहार में विविधता लाने तथा व्यवहारगत परिवर्तन पर आधारित एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाती है।
स्रोत: TH
समहिता परियोजना (SAMHiTA Project)
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
समाचारों में
- भारत और श्रीलंका ने कोलंबो स्थित गंगारामया मंदिर में समहिता परियोजना का शुभारंभ किया है।
परियोजना के बारे में
- पूरा नाम: दक्षिण एशियाई पांडुलिपि इतिहास एवं पाठ्य अभिलेखागार।
- ‘समहिता’ संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है—संकलन।
- संचालन: नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) भारत सरकार से प्राप्त अनुदान सहायता के माध्यम से इस परियोजना को संचालित कर रहा है।
- उद्भव: इस परियोजना का शुभारंभ वर्ष 2022 में विदेश मंत्रालय के सहयोग से किया गया था। इसका प्रारंभिक उद्देश्य समय के साथ भारत से विदेशों में पहुँची भारतीय पांडुलिपियों का एक डिजिटल आँकड़ा-संग्रह तैयार करना था।
- इस परियोजना का मार्गदर्शन डॉ. सुधा गोपालकृष्णन कर रही हैं, जो भारत के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की संस्थापक निदेशक रही हैं।
- व्यापक उद्देश्य: भारत से बाहर स्थित पुस्तकालयों और अभिलेखागारों में संरक्षित दक्षिण एशियाई पांडुलिपियों का एक परस्पर संबद्ध आँकड़ा-संग्रह तथा डिजिटल अभिलेखागार तैयार करना।
- यह भारत और दक्षिण एशिया से बाहर स्थित पांडुलिपि-संग्रहों को एक साझा मंच पर लाने का प्रथम प्रयास है।
यह परियोजना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- विरासत का संरक्षण: ताड़पत्रों पर लिखी गई तथा अन्य प्राचीन पांडुलिपियाँ समय, जलवायु और उपेक्षा के कारण नष्ट होने लगती हैं। उनकी डिजिटल प्रतियाँ उनकी विषयवस्तु को सुरक्षित रखती हैं और विद्वानों के लिए सुलभ बनाती हैं।
- सांस्कृतिक कूटनीति: यह परियोजना भारत और श्रीलंका के बीच प्राचीन बौद्ध एवं सभ्यतागत संबंधों को आगे बढ़ाती है। साथ ही, यह भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति तथा सांस्कृतिक प्रभाव के माध्यम से संबंधों को सुदृढ़ करने के प्रयासों के अनुरूप है।
- स्थानीय भागीदारी: पांडुलिपियों का अंकीयकरण श्रीलंका के विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। इससे यह प्रयास एकतरफा न होकर साझा सहयोग पर आधारित बनता है।
- क्षेत्रीय पहुँच: समहिता परियोजना भूटान, कंबोडिया, नेपाल और श्रीलंका के संस्थानों के साथ भी कार्य करती है।
स्रोत: PIB
‘क्लिक करके सदस्यता रद्द करने’ का नियम
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
समाचारों में
- न्यूयॉर्क शहर के महापौर जोहरान ममदानी ने शहर के ‘क्लिक करके सदस्यता रद्द करने’ संबंधी नियम को लागू करने की घोषणा की। इस नियम के अंतर्गत निवासी किसी सेवा की सदस्यता उतनी ही आसानी से रद्द कर सकेंगे, जितनी आसानी से वे उसकी सदस्यता लेते हैं। आदर्श रूप से, यह कार्य केवल एक बार क्लिक करके किया जा सकेगा।
‘क्लिक करके सदस्यता रद्द करने’ संबंधी कानून
- इस नियम का उद्देश्य उपभोक्ताओं को अनुचित सदस्यता प्रथाओं से सुरक्षा प्रदान करना है। इसके अंतर्गत किसी सेवा की सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया उतनी ही सरल होनी चाहिए, जितनी उसकी सदस्यता लेने की प्रक्रिया होती है।
- कंपनियाँ प्रायः उपभोक्ताओं को सदस्यता रद्द करने से हतोत्साहित करने के लिए भ्रामक डिजिटल युक्तियों, जटिल विकल्प-सूचियों, लंबी प्रक्रियाओं अथवा अनिवार्य दूरभाष कॉल और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने जैसी शर्तों का उपयोग करती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
- यह कानून कुछ सीमित अपवादों को छोड़कर, स्वतः नवीनीकरण अथवा निरंतर सेवाएँ प्रदान करने वाली अधिकांश सदस्यताओं पर लागू होता है।
- इसके अंतर्गत कंपनियों को सदस्यता लेने के लिए प्रयुक्त माध्यम से ही उसे रद्द करने की सरल प्रक्रिया उपलब्ध करानी होगी।
- निवासी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं, जिनके समाधान के लिए मध्यस्थता की जा सकती है। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर 525 डॉलर से शुरू होने वाले नागरिक दंड लगाए जा सकते हैं।
- इस कानून से पारदर्शिता, निष्पक्षता और उपभोक्ता सुविधा बढ़ने के कारण न्यूयॉर्क के निवासियों को प्रतिवर्ष 16.25 करोड़ डॉलर तक की बचत होने की भी संभावना है।
भारत का दृष्टिकोण
- भारत में अभी तक न्यूयॉर्क शहर जैसी व्यापक ‘क्लिक करके सदस्यता रद्द करने’ की नीति लागू नहीं है।
- हालाँकि, भारतीय रिज़र्व बैंक की डिजिटल भुगतान—ई-मैंडेट रूपरेखा के अंतर्गत आवर्ती भुगतानों से कम-से-कम 24 घंटे पहले ग्राहकों को पूर्व-सूचना देना अनिवार्य है।
- इस सूचना में व्यापारी का नाम, लेन-देन की राशि, खाते से राशि काटे जाने की तिथि आदि विवरण शामिल होने चाहिए। लेन-देन के बाद भी ग्राहक को सूचना दी जाती है।
- इस व्यवस्था से ग्राहकों के खातों से बिना पूर्व जानकारी के राशि कटने की समस्या को कम करने में सहायता मिलती है। हालाँकि, यह सदस्यता रद्द करने के भ्रामक तरीकों अथवा डिजिटल माध्यमों पर अपनाई जाने वाली ‘भ्रामक अभिकल्पनाओं’ (डार्क पैटर्न) की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं करती।
- जून 2026 में डैटम इंटेलिजेंस द्वारा किए गए ‘भ्रामक अभिकल्पनाओं के प्रति उपभोक्ता धारणा अध्ययन’ से पता चला कि नायका, अमेज़न, फ्लिपकार्ट, ज़ेप्टो और ब्लिंकिट जैसे वाणिज्यिक तथा त्वरित-वाणिज्य मंचों पर निःशुल्क परीक्षण अवधि समाप्त होने और भुगतान शुरू होने से पहले नवीनीकरण संबंधी सूचनाएँ उपलब्ध नहीं कराई गईं। साथ ही, सदस्यता रद्द करने के लिए चार से अधिक चरणों से गुजरना पड़ा।
- इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान भुगतान-सुरक्षा उपायों के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं के सामने अवांछित सदस्यताओं को सरलता और पारदर्शिता के साथ समाप्त करने की गंभीर चुनौती बनी हुई है।
स्रोत: TH
भारत में E100 मिश्रित ईंधन पर चलने वाले वाहनों के लिए मार्ग प्रशस्त
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
समाचारों में
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली, 1989 में संशोधन किया है। इसके माध्यम से E100 तक इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलने वाले वाहनों के परीक्षण, प्रमाणीकरण और व्यावसायिक उपयोग को कानूनी अनुमति प्रदान की गई है।
परिचय
- E100: लगभग शुद्ध जैव-इथेनॉल। इसका उत्पादन गन्ने के रस, शीरे, मक्का अथवा अनुपयोगी खाद्यान्न के किण्वन से किया जाता है। इसमें इथेनॉल को विकृत करने तथा संक्षारण रोकने के लिए कुछ मात्रा में अन्य पदार्थ मिलाए जाते हैं।
- लचीले ईंधन पर चलने वाले वाहन (FFVs): इन वाहनों में विशेष ईंधन प्रणालियों और संवेदकों से युक्त पेट्रोल इंजन होते हैं। ये इंजन की कार्यप्रणाली को स्वतः समायोजित कर सकते हैं, जिससे वाहन पेट्रोल, E100 अथवा इनके बीच के किसी भी मिश्रण, जैसे E20 और E85, पर चल सकते हैं।
यह कदम क्यों उठाया गया?
- कच्चे तेल के आयात में कमी: आयात पर निर्भरता घटाना तथा वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रभाव से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखना।
- उत्सर्जन में कमी: सड़क परिवहन से होने वाले प्रदूषणकारी उत्सर्जन को कम करना।
- कृषि उत्पादों के लिए स्थिर बाजार: गन्ने, मक्के और अन्य अनाज की माँग बढ़ाकर किसानों, आसवनशालाओं तथा ग्रामीण रोजगार को प्रोत्साहन देना।
लचीले ईंधन वाले वाहन सामान्य वाहनों से किस प्रकार भिन्न हैं?
- इथेनॉल-प्रतिरोधी ईंधन प्रणाली: इथेनॉल आर्द्रता को अवशोषित करता है, इसलिए इन वाहनों में ऐसे स्टेनलेस स्टील, विशेष बहुलक और सील का उपयोग किया जाता है, जो संक्षारण का प्रतिरोध कर सकें।
- स्मार्ट नियंत्रण इकाई: यह ईंधन में इथेनॉल की मात्रा का पता लगाकर ईंधन और वायु के अनुपात तथा प्रज्वलन के समय को समायोजित करती है।
- उच्च ऑक्टेन संख्या का लाभ: इथेनॉल इंजन में असामान्य दहन की संभावना को कम करता है, जिससे इंजन को बेहतर दक्षता के लिए समायोजित किया जा सकता है।
- बड़े ईंधन इंजेक्टर और पंप: इथेनॉल की ऊर्जा-सामग्री कम होने के कारण इसकी पूर्ति के लिए ये लगभग 30% अधिक ईंधन पहुँचाते हैं।
- ठंड में इंजन चालू करने की सुविधा: कम तापमान पर इथेनॉल का वाष्पीकरण कठिन होने के कारण ईंधन को गर्म करने अथवा थोड़ी मात्रा में पेट्रोल डालने की व्यवस्था की जाती है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- कम माइलेज: इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 30% कम ऊर्जा होती है। इसलिए इससे होने वाली बचत ईंधन की कीमतों और कर-संबंधी प्रोत्साहनों पर निर्भर करती है।
- जल संकट: गन्ने और धान की खेती में अधिक जल की आवश्यकता होती है। इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से भूजल पर दबाव बढ़ सकता है तथा खाद्य फसलों के लिए उपलब्ध भूमि का उपयोग प्रभावित हो सकता है।
- पुराने वाहनों की अनुपयुक्तता: E10 या E20 ईंधन के लिए निर्मित वाहन आवश्यक संशोधनों के बिना सुरक्षित रूप से E100 पर नहीं चल सकते। इससे संक्षारण, ईंधन रिसाव और इंजन को क्षति पहुँचने का जोखिम रहता है।
- सहायक अवसंरचना: तेल कंपनियों से प्रमुख शहरों और कृषि क्षेत्रों में E100 के लिए समर्पित ईंधन केंद्र स्थापित करने की अपेक्षा है। साथ ही, वाहन निर्माताओं को लचीले ईंधन पर चलने वाले वाहनों की अपनी श्रेणी का विस्तार करना होगा।
स्रोत: IE
जल-मिश्रित बीज छिड़काव तकनीक (हाइड्रोसीडिंग)
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
समाचारों में
- टाटा स्टील ने झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित अपने वेस्ट बोकारो प्रभाग में जल-मिश्रित बीज छिड़काव तकनीक की शुरुआत की है।
जल-मिश्रित बीज छिड़काव तकनीक क्या है?
- यह पौधरोपण की एक यंत्रीकृत विधि है। इसमें बीज, पलवार सामग्री, उर्वरक और एक बंधनकारी पदार्थ को जल के साथ मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है। इसके बाद उच्च दाब वाली मशीन की सहायता से इस घोल का छिड़काव खाली या वनस्पतिहीन भूमि पर किया जाता है।
- यह तकनीक क्षतिग्रस्त भूमि पर शीघ्र हरित आवरण विकसित करने, ढलानों की मृदा को स्थिर रखने, वायु और जल से होने वाले मृदा अपरदन को रोकने तथा भारी मात्रा में हाथ से पौधरोपण किए बिना खनन से निकली अतिरिक्त मृदा के ढेरों के पुनर्वास में सहायक होती है।

प्रमुख लाभ
- मृदा अपरदन पर नियंत्रण: यह मृदा के कणों को बाँधकर रखती है, जिससे वर्षा के जल से मृदा अपरदन, छोटी-छोटी नालियाँ बनने तथा मृदा के ढेरों की ढलानों पर भूस्खलन होने का जोखिम कम होता है।
- तीव्रता से वनस्पति विकास: पोषक तत्त्वों से भरपूर घोल बीजों को प्रारंभ से ही जल और पोषण उपलब्ध कराता है। इससे बीजों का समान रूप से अंकुरण होता है तथा जड़ों का घना जाल विकसित होता है।
- लागत-प्रभावी: बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में घास की परत बिछाने अथवा हाथ से पौधरोपण करने की तुलना में यह तकनीक श्रम और परिवहन की लागत कम करती है।
स्रोत: IE
प्रोटीन की जैव-उपलब्धता
पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य; GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- वैज्ञानिकों ने यह जाँच की कि पारंपरिक मांस और पौधों से निर्मित मांस में उपस्थित प्रोटीन की जैव-उपलब्धता—अर्थात शरीर द्वारा पोषण के लिए उपयोग किए जा सकने वाले प्रोटीन की मात्रा—क्या समान होती है।
- अध्ययन में पाया गया कि पौधों से निर्मित मांस में प्रोटीन की जैव-उपलब्धता उसके पारंपरिक मांस वाले समकक्ष की तुलना में अधिक थी।
परिचय
- पौध-आधारित प्रोटीन: ऐसा प्रोटीन जो पशु-स्रोतों के बजाय पौधों से प्राप्त होता है।
- प्रोटीन आवश्यक पोषक तत्त्व हैं, जो शरीर की वृद्धि, ऊतकों की मरम्मत और शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- प्रोटीन सैकड़ों या हजारों छोटी इकाइयों से मिलकर बने होते हैं, जिन्हें अमीनो अम्ल कहा जाता है। ये इकाइयाँ लंबी शृंखलाओं में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।
- अमीनो अम्लों के 20 विभिन्न प्रकार होते हैं, जो अलग-अलग संयोजनों में मिलकर प्रोटीन का निर्माण कर सकते हैं।

- अमीनो अम्लों के निर्माण से संबंधित आनुवंशिक संकेत डीएनए के तीन-तीन न्यूक्लियोटाइड वाले संयोजनों द्वारा निर्धारित होते हैं। ये संयोजन जीन के क्रम पर निर्भर करते हैं।
- आवश्यक अमीनो अम्ल: ये ऐसे कार्बनिक यौगिक हैं, जिनका निर्माण मानव शरीर स्वयं नहीं कर सकता अथवा पर्याप्त मात्रा में नहीं कर पाता। इसलिए इन्हें आहार से प्राप्त करना आवश्यक होता है।
- नौ आवश्यक अमीनो अम्ल हैं—हिस्टिडीन, आइसोल्यूसीन, ल्यूसीन, लाइसीन, मेथियोनीन, फेनिलएलनिन, थ्रेओनीन, ट्रिप्टोफैन और वेलीन।
- ये अमीनो अम्ल प्रोटीन, हार्मोन और तंत्रिका-संचारक पदार्थों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 27-10-2026